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Wednesday, 26 September 2018

👇ये भी एक मुर्ति-पुजा है👇

👇ये भी एक मुर्ति-पुजा है👇

👉जो परमेश्वर से ज्यादा माता-पिता को चाहता है वह परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा पत्नी को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा अपने मित्रों को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा अपने बच्चो को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा व्यपार को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा धन को चहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा अपने "सपने" को पुरा करना चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा अपनी इच्छा चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा अपने घर को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा पास्टर,प्रचारक,बिशप,सेवक को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा प्रेमी,प्रेमिका को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा अपने आप को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं
👉जो परमेश्वर से ज्यादा अपने काम को चाहता है वो परमेश्वर के योग्य नहीं....
वो इसलिए कि वचन इस प्रकार कहता है

“कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा, या एक से निष्ठावान रहेगा और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम परमेश्‍वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।
👉मत्ती 6:24
यहाँ बात सिर्फ़ धन की ही नहीं पर उसकी भी है जिसकी मुरत मनुष्य अपने हिर्दय में बसा रखा है वो परमेश्वर से ज्यादा उससे प्रेम करता है, और अपने हिर्दय में परमेश्वर की जगह उसे स्थान देता है, जो मन में बसा हो हर समय सिर्फ़ उसी बारे में सोचता हो तो ये मन में उस व्यक्ति की मुरत बन जाती है जिसे मन में बसी मुरत कहते हैं, " जो एक मुर्ति-पुजा कहलाता है
मन की मुरत के विषय में यहेजकेल 14:4 कहता है-
"हे मनुष्य के सन्तान, इन पुरुषों ने तो अपनी मूरतें अपने मन में स्थापित की, और अपने अधर्म की ठोकर अपने सामने रखी है; फिर क्या वे मुझसे कुछ भी पूछने पाएँगे? इसलिए तू उनसे कह, प्रभु यहोवा यह कहता है : इस्राएल के घराने में से जो कोई अपनी मूर्तियाँ अपने मन में स्थापित करके, और अपने अधर्म की ठोकर अपने सामने रखकर भविष्यद्वक्ता के पास आए, उसको, मैं यहोवा, उसकी बहुत सी मूरतों के अनुसार ही उत्तर दूँगा, जिससे इस्राएल का घराना, जो अपनी मूर्तियाँ के द्वारा मुझे त्याग कर दूर हो गया है, उन्हें मैं उन्हीं के मन के द्वारा फँसाऊँगा।
👉यहेजकेल 14:3‭-‬5
इस वचन में हर एक मनुष्य की
इच्छा
सपने
पाने की लालसा
किसी को अपना आदर्श
शौक

इन सब के विषय में कहता है कि इन सब के द्वारा ही हमें परमेश्वर फ़सायेगा,
जरा सोच कर देखो जो सपने, मांग, इच्छा शौक, इन सबके लिये परमेश्वर से प्रार्थना करता है और वो इस इच्छा में परमेश्वर की इच्छा को महोत्व नहीं देता है और न ही परमेश्वर की इच्छा और उद्देश्य को जाने बिना खुद अपनी मांगे परमेश्वर के सामने ही रखता है,

मतलब वो हिर्दय की मुरत बन जाती है वचन के अनुसार जब ऐसी सोच लेकर परमेश्वर के सामने जाते हो तो परमेश्वर अपने दास के द्वारा तुम्हारा नाम पुकारा जाता है और वो चिज़े तुम्हे चाहिये वो चिज़े परमेश्वर के दास तुम्हारे लिए कहता है तो तुम इस बात से बहुत खुश हो जाते हो कि परमेश्वर ने मेरी प्रार्थना को सुना है...

लेकिन जब परमेश्वर ने तुम्हारी ये प्रार्थना को सुनकर पुरा कर दिया तो कुछ ही दिनों में हालत पहले से और भी खराब क्यों हो जाती है🤔 वो काम बिगड़ कैसे गया🤔जब परमेश्वर की इच्छा थी तो ऐसी गड़बड़ी कैसे हो गई
वो इसलिए कि हम परमेश्वर की इच्छा से नहीं अपनी इच्छा ही परमेश्वर पर थोपना चाहते हैं....

यीशु के पुरे जीवनकाल में यीशु सिर्फ़ परमेश्वर की इच्छा को पुरी करता रहा, एक इच्छा यीशु ने परमेश्वर से कही भी थी उसमें भी यीशु ने ये कहा "मेरी नहीं तेरी इच्छा पुरी हो"
यीशु के मन में किसी इच्छा या किसी व्यक्ति की मुरत नहीं थी
लेकिन हम तो इच्छाओ का, सपनो का, अभिलाषाओ का, आदर्शओ का  समुद्र रखते हैं अपने मनो में
क्या अब भी कह सकते हैं कि  हम परमेश्वर के योग्य है??🤔अगर लोग कहते हैं कि हम परमेश्वर को छोड़ किसी को अपना आदर्श नहीं मानते हैं तो मैं उन लोगो से कहना चाहता हूँ कि फ़िर आपके प्रोफ़ाइल, dp में फ़िल्म कलाकार, tv सिरियल के कलाकार, पास्टर,  दास, क्रिकेटर आदि की तस्वीर क्या कर रही हैं???....आदर्श नहीं मानते हो तो....🤔🤔🤔🤔
जय मसीह की

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